चालाक लोमड़ी और उसका बच्चा

चालाक लोमड़ी और उसका बच्चा

दंडक वन में एक लोमड़ी अपने छोटे से बच्चे के साथ रहा करती थी। लोमड़ी अपने बच्चे से बहुत प्यार करती थी। एक दिन वो बच्चा अपनी माँ से कहता है कि मां मुझे भूख लगी है और  कुछ खाने को चाहिए ।

लोमड़ी जंगल में गई और खाना ढूंढने  लगी। कुछ देर बाद उसे रास्ते में मरी हुई एक गाय दिखाई दी, लोमड़ी गाय के शरीर से कुछ मांस चीरा और अपने बच्चे पास लौट आई लेकिन बच्चे से मांस खाने से मना कर दिया और उदास हो गया।

लोमड़ी दोबारा जंगल में भटकने लगी और इस बार वह कहीं से एक सूअर का मांस ले आई। लेकिन लोमड़ी के बच्चे ने उसे खाने से भी मना कर दिया।।

इस बार लोमड़ी ने बच्चे से ही पूछ लिया कि उसे किस जानवर का मांस खाना है। इस पर लोमड़ी का बच्चा अपनी माँ से कहता है कि उसे किसी जानवर का नहीं बल्कि इंसान का मांस खाना है । लोमड़ी सोच में डूब गई। इसान का मांस लाना उसके लिए असंभव  सा प्रतीत हो  रहा था। तभी उसे तरकीब सूजी।

उसने गाय के मांस को नजदीक के एक शहर के मंदिर के सामने छोड़ दिया और सूअर के मांस को मस्जिद के पास फेंक दिया । थोड़ी ही देर में शहर में अफरा-तफरी मच गई और लोग एक दूसरे की जान लेने को उतारू हो गए इस लड़ाई में काफी लोग मारे गए ।

और अंततः लोमड़ी ने अपने बच्चे को खाने के लिए इंसान का मांस दिया, जिसे पाकर वह बच्चा बहुत खुश हुआ ।

 

शिक्षा:-  अक्सर हमारे आपसी मतभेदों का फायदा कोई तीसरा उठा ले जाता है ।

मित्र कौआ और धूर्त सियार

किसी वन में एक कौआ और एक हिरण रहता था। दोनों में गहरी मित्रता थी। प्रतिदिन हिरण चौकड़ी भरता हुआ पेड़ पर रहने वाले कौए के पास आया करता था और दोनों देर तक प्रेम से बातें किया करते थे। हिरण खूब हट्टा-कट्टा था। बड़े जानवर उसे अपना भोजन बनाने की ताक में रहते थे पर उसका मित्र कौआ सदा उसकी रक्षा किया करता था। कई दिनों से एक सियार की नजर हिरण पर थी। वह हिरण को मारकर खाना चाहता था।

बहुत सोच विचार कर उसने हिरण से मित्रता करने की ठानी। एक दिन कौआ कहीं बाहर गया हुआ था। उसके पीछे से वह हिरण के पास जाकर बोला, “मित्र! मैं इस वन के दूसरी ओर रहता था। वन का यह भाग मुझे बहुत पसंद आया है। तुम मुझे दिखे तो बहुत अच्छे लगे। मैं तुम्हारे साथ मित्रता करना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे मित्र बनोगे?” भोले-भाले हिरण ने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली। बाद में कौए से मिलने पर उसने उसे सारी बातें बताईं।

सियार की चालाकी और मक्कारी कौए को भली-भांति पता थी पर कौए ने सोचा कि यदि हिरण उसे विश्वास योग्य समझता है तो संभव है वह सही हो। सियार और हिरण साथ-साथ समय व्यतीत करने लगे। हिरण सियार पर विश्वास करने लगा था और सियार उसे मारकर खाने के लिए उचित अवसर की तलाश में था।

एक दिन एक शिकारी ने उस हिरण को देखा और उसे फँसाने के लिए अपना जाल बिछा दिया। सियार शिकारी को जाल बिछाते देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गया। उसने सोचा कि ईश्वर ने उसकी सुन ली है। अब वह शिकारी को मूर्ख बनाकर हिरण को खाने में सफल हो जाएगा। मन ही मन प्रसन्न होता हुआ सियार हिरण के पास गया और बोला, “मित्र! तुम्हारे लिए मैं एक बहुत ही अच्छी खबर लाया हूँ। आज तो तुम जमकर दावत करो। मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें मक्के का खेत दिखाता हूँ।”

मूर्ख हिरण खुशी-खुशी सियार के पीछे चल पड़ा। सियार उसे उसी जगह ले गया जहाँ शिकारी ने जाल बिछाकर मक्के डाले थे। मक्का देखते ही हिरण के मुंह में पानी भर आया। वह भागकर मक्का खाने गया पर तभी उसके पैर जाल में फँस गए। हिरण को कुछ खतरे का एहसास हुआ। आशापूर्ण दृष्टि से उसने सियार को देखकर निवेदन किया, “हे मित्र! लगता है मैं फँस गया हूँ। क्या तुम मुझे इस जाल से निकाल सकते हो?”

सियार ने बहाना बनाते हुए कहा, “अरे! यह क्या हुआ? ओह! यह कैसा दुर्भाग्य है? मैं तुम्हें आजाद करना चाहता हूँ पर वह देखो- जाल का फंदा चमड़े का बना हुआ है और आज मेरा व्रत है… मैं आज फंदा नहीं छू सकता हूँ… तुम कल सुबह तक सब्र करो। मैं भोर होते ही आकर फंदा काटकर तुम्हें बचा लूंगा।”

इस प्रकार बातें बनाकर सियार वहाँ से चला तो गया पर वह प्रातः की प्रतीक्षा करने लगा जब वह शिकारी से पहले आकर हिरण को अपना शिकार बना सके। उधर कौआ काफी देर तक हिरण की प्रतीक्षा करता रहा। उसके नहीं आने से कौए ने सोचा कि हो न हो हिरण किसी मुसीबत में है। कौआ उसे ढूँढने लगा। ढूँढते-ढूँढते वह जाल में फँसे हिरण के पास पहुँच गया। हिरण ने कौए को सियार द्धारा दिए गए प्रलोभन और कल प्रातः मदद के लिए आने के वादे की बात बताई।

कौए ने हिरण से कहा, “मित्र! यदि तुम किसी पर भी बिना सोचे विचारे विश्वास कर लोगे तो ऐसा ही हाल होगा। सियार ने तुम्हें धोखा दिया है। उसकी मंशा तो कुछ और ही है। अब सुनो, मैं जैसा कहता हूँ वैसा ही करना।” अगली सुबह जब शिकारी आया तब हिरण चुपचाप स्थिर पड़ा रहा। हट्टे-कट्टे हिरण को जाल में फँसा देखकर शिकारी अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसे निश्चेष्ट पड़ा देखकर शिकारी ने उसे मृत समझा।

उसके जाल हटाते ही हिरण ने बिजली की गति से छलांग लगाई और पलक झपकते ही वन में भाग गया। स्तब्ध् शिकारी ने अपने हाथ की छड़ी को हिरण की दिशा में फेंका। निशाना चूक गया और छड़ी जोर से आते हुए सियार को जा लगी। हुआ यों कि शिकारी ने हड़बड़ी में आते हुए सियार को ही निशाना साध् लिया था। वह छड़ी-सियार को इतनी जोर से लगी कि सियार वहीं ढेर हो गया। हिरण और कौआ सही सलामत वापस घर पहुँच गए।

शिक्षाः मित्र के चयन में सदा सावधनी बरतनी चाहिए।

 

महत्त्वाकांक्षी हाथी और गीदड़

बहुत पुरानी बात है किसी जंगल में एक हाथी रहता था। उसे अपनी योग्यता और अपनी शक्तियों पर बहुत गर्व था। यहाँ तक कि वह वनराज शेर को भी अपने समक्ष कुछ नहीं समझता था तथा उसका आदर नहीं करता था। शेर की बुलाई सभा में सभी पशु जाते थे पर हाथी कोई न कोई बहाना बनाकर रह जाता था। हाथी बस दिवास्वप्न देखने में मग्न रहता था। जिससे भी मिलता अपनी डींगे हाँकने में मग्न रहता। बस यही कहता था कि उसमें राजा बनने के सभी गुण हैं, एक दिन वह अवश्य राजा बनेगा।

एक दिन एक चतुर गीदड़ उस जंगल में आया। वह कई दिनों से भूखा था और भोजन की खोज में ही इस जंगल में आया था। उसने नदी में धूप का आनंद उठाते हुए हाथी को देखा। हाथी उस समय अकेला ही था। चालाक गीदड़ को एक युक्ति सूझी। उसने सोचा कि यदि इस मोटे तगड़े हाथी को मार दिया जाए तो कई दिनों के भोजन का प्रबंध् हो सकता है। इस विचार मात्र से ही गीदड़ के मुंह में पानी आने लगा। पर वह तो छोटा जीव है और हाथी इतना बड़ा है, उसे कैसे वश में किया जाए… सोचते-सोचते अचानक गीदड़ को अपने वन के दलदल की याद आई। उसने सोचा, “क्यों न हाथी को मैं दलदल तक ले जाऊँ तो वह अवश्य उसमें फँस जाएगा।”

गीदड़ अपने विचार से प्रसन्न होता हुआ हाथी के पास गया और उसे नमन करके बोला, “हे महाराज! मेरा विनम्र अभिवादन स्वीकार करें। “

मस्त हाथी अचानक ऐसी आवाज सुनकर भौंचक्का रह गया। अपनी गर्दन घुमाकर उसने इधर-उधर देखा तो उसे सामने नतमस्तक गीदड़ दिखाई दिया।

भावना में बहते हुए हाथी ने प्रसन्नतापूर्वक गीदड़ कहा, “अरे तुम कौन हो? मुझे महाराज कहकर क्यों संबोधित कर रहे हो? मैं अभी तक जंगल का राजा बना तो नहीं हूँ पर तुम शीघ्र ही मुझे राजगद्दी पर बैठे हुए पाओगे।

हाथी की बातों से गीदड़ को लगा कि उसकी युक्ति काम कर रही है। पुनः उसने स्पष्ट करते हुए कहा, “नहीं, नहीं महाराज… मेरा यह तात्पर्य नहीं था कि आप इस जंगल के राजा हैं… मैं तो यह कहना चाहता था कि आप हमारे जंगल के राजा बन सकते हैं।

हाथी को गीदड़ की बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। उसने उत्सुकता जताते हुए कहा, “तुम्हारा जंगल? वह कहाँ

गीदड़ ने कहना प्रारम्भ किया, “महाराज, मैं उस बग वाले जंगल में रहता हूँ। वहाँ राजा के न होने के कारण कोई अनुशासन नहीं है। जंगलवासियों ने एक सभा बुलाई और सर्वसम्मति से यह निर्धारित हुआ कि हममें से कोई पास के जंगल में जाकर किसी शक्तिशाली जीव को ढूँढकर लाएगा और वही हमारा राजा बनेगा। तदनुसार ही मैं इस जंगल में सही प्राणी की खोज में आया हूँ जो हमारे जंगल पर शासन कर सके। आपको देखते ही मैं तुरंत समझ गया कि आप एक जिम्मेदार और महान प्राणी हैं तथा एक श्रेष्ठ राजा साबित होंगे। इसीलिए मैंने आपको महाराज कहकर संबोधित किया था… महाराज, क्या अब आप हमारे जंगल में पधारकर ताज को स्वीकारने की कृपा करेंगे? हमें राजा की शीघ्रातिशीघ्र आवश्यकता है। सभी ताजपोशी के समारोह के लिए अधीर हो रहे हैं। “

गीदड़ की चापलूसी रंग लाई। खुशी से झूमता हुआ हाथी अपनी जगह से उठा और मदमस्त चाल से गीदड़ के साथ चलने लगा। हाथी स्वयं को सचमुच राजा महसूस करने लगा और उसने गीदड़ को आगे चलने के लिए कहा। दोनों जंगल पार कर दूसरे जंगल में पहुँचे। हाथी अपनी कल्पना, अपनी धुन में मदमस्त चलता चला जा रहा था । उसने दलदल नहीं देखा। अचानक जब दलदल में उसका पैर धँसने लगा तब घबराकर उसने गीदड़ को पुकारा और कहा, “मित्र, मैं फँस गया हूँ। मुझे बाहर निकालने में मेरी सहायता करो… जाओ, अपने सभी मित्रों को बुला लाओ।”

गीदड़ ने जोरों का अट्टहास किया और व्यंग्यपूर्वक बोला, “मेरे प्यारे महाराज! आप अच्छे मूर्ख बने। मैं यहाँ आपको अपने भोजन के लिए लाया हूँ, न कि राजा बनाने… हाँ, मैं अभी अपने मित्रों को बुलाकर लाता हूँ… आपकी रक्षा के लिए नहीं वरन् दावत खाने के लिए…” ऐसा कहकर गीदड़ हँसता हुआ वहाँ से दोस्तों को लाने चला गया और हाथी मदद के लिए पुकारता ही रह गया। अंत में वहीं उसका दम निकल गया।शिक्षा: गर्व ही पतन का कारण है ।

शेर और बिल्ली

किसी जंगल में एक शेर पूरे राजसी ठाट-बाट से रहता था। उसकी गुफा के पास ही एक बिल था जिसमें एक चूहा रहने लगा था । प्रतिदिन भोजन के पश्चात् दोपहर में शेर को झपकी लेने की आदत थी। उसकी निद्रा में कोई बाधा डाले यह उसे कतई पसंद नहीं था। पहले तो चूहा शेर से बहुत घबराता था पर धीरे-धीरे वह सहज हो गया। शेर के सोने के बाद वह बाहर आता और खूब उछल-कूद मचाता कभी शेर की पूंछ पर फुदकता तो कभी उसके बालों से खेलता।

एक दिन जब शेर सो रहा था तब चूहा जाकर उसकी नाक में उंगली डालने लगा, उसके गले के बालों में हाथ फेरने लगा। शेर को सुरसुरी हुई, वह उठकर जोर से दहाड़ा। चूहा डर के मारे उछला और दूर जाकर गिरा। शेर फिर सो गया। चूहे को छुपम छुपाई के इस खेल में बड़ा मजा आने लगा। दो-तीन दिनों तक यही क्रम चला फिर शेर अपना क्रोध् बर्दाश्त न कर सका। वह चूहे से मुक्ति पाने का मार्ग ढूँढने लगा। सोचते-सोचते उसे एक युक्ति सूझी…क्यों एक बिल्ली को वश में किया जाए ! बिल्ली ही चूहे को आराम से मार सकती है।

शेर बिल्ली की खोज में जंगल में निकला। काफी देर के बाद उसे एक बिल्ली मिली। शेर ने उससे कहा, “प्रिय बिल्ली, तुम्हारे लिए एक अत्यंत सुनहरा अवसर है। तुम्हें प्रतिदिन चूहे का भोजन करने को मिलेगा यदि तुम मे मानो तो…।”

बिल्ली ने सोचा, “भला इससे अच्छा और क्या हो सकता है… बैठे बिठाए प्रतिदिन भोजन का प्रबंध् हो रहा है…” फिर भी अपनी शंका दूर करने के लिए उसने शेर से पूछा, “पर यदि प्रतिदिन मुझे एक चूहा न मिला तो ? दूसरी बात, यहाँ मेरा घर है, मैं इसे कैसे छोड़ दूँ? ” शेर ने

बिल्ली को आश्वस्त करते हुए कहा कि उसे प्रतिदिन एक चूहा अवश्य मिलेगा। हालांकि शेर जानता था कि उसकी गुफा में एक ही चूहा है पर यदि सत्य बताता तो बिल्ली नहीं

बिल्ली ने शेर की बात पर विश्वास कर लिया और दोनों गुफा की ओर चल पड़े। चूहे ने बिल्ली को आते देख लिया था । वह सावधान होकर छिप गया। अब बड़ी होशियारी से वह तभी अपने बिल से बाहर निकलता जब शेर और बिल्ली सो रहे होते थे। कई दिन यों ही बीत गए । बिल्ली तो कुछ न कुछ शिकार करके अपना पेट भर लेती थी पर चूहा भीतर बैठा-बैठा भूख से बेहाल होने लगा।

छिपे-छिपे, भूख से बेहाल चूहे ने एक दिन सोचा, “ऐसे काम नहीं चलेगा… इतना भय भी किस काम का…” वह चुपके से दबे पांव बिल से बाहर निकला बिल्ली घात लगाए बैठी थी। उसने लपककर चूहे को पकड़ लिया । शेर ने यह देखा तो अत्यंत प्रसन्न होकर उसने बिल्ली की खूब तारीफ करी । शेर का प्रयोजन पूरा हो गया था। बिल्ली और चूहों की ताक में घात लगाए बैठी रही। शेर जानता था कि बिल्ली को अब और कोई चूहा नहीं मिलने वाला है इसलिए उसने बिल्ली के विषय में सोचना ही छोड़ दिया। उसका काम हो चुका था।

शिक्षाः अवसरवादियों से सदा सावधान रहना चाहिए ।

 

 

दयालु बगुला और कुटिल कौवा

उज्जैन नगरी में एक बड़े से पीपल के वृक्ष पर एक कौआ और एक बगुला रहता था। दोनों अच्छे मित्र थे पर दोनों का स्वभाव एक दूसरे से एकदम अलग था। बगुला अत्यंत दयालु था। वह सदा दूसरों का ख्याल रखा करता था किन्तु कौआ स्वार्थी और दुष्टात्मा था। वह सदा बगुला को स्वार्थी बनने तथा अपने काम से काम रखने का पाठ पढ़ाया करता था किन्तु बगुला सदा उसकी बातों को हवा में उड़ा दिया करता था।

एक बार की बात है। भरी दोपहरी थी । सूर्य का तेज अत्यधिक था। एक शिकारी पीपल के पेड़ के नीचे से जा रहा था। वह थकावट से चूर था। पेड़ की छांव देखकर उसने अपना तीर-धनुष वहीं रखा और आराम करने के लिए लेट गया। उसकी आँख लग गई।

थोड़ी देर के बाद सूर्य की किरणें उसके चेहरे पर पड़ने लगीं। बगुले को सोए हुए शिकारी पर दया आई। वह शिकारी की सहायता का उपाय सोचने लगा। उसे एक युक्ति सूझी। उसने अपना पंख फैलाया और जहाँ से किरणें आ रही थीं वहीं बैठ गया जिससे शिकारी के चेहरे

पर किरणें न पड़ें। शिकारी गहरी नींद में सो गया। उसका मुंह खुला हुआ था और वह खर्राटे लेने लगा।

कौवा पेड़ की डाल पर बैठा बैठा यह सब देख रहा था । उसे शरारत सूझी। उसने बगुले और यात्री को छेड़ने की सोची। असल में वह बगुले को पाठ पढ़ाना चाहता था कि व्यर्थ में सबकी सहायता नहीं करनी चाहिए। कौवा ब के फैले पंख के नीचे से उड़ता हुआ गया और विष्ठा कर दी । विष्ठा सीधो शिकारी के खुले हुए मुंह में जाकर गिरी । वह उड़ता हुआ वापस अपने स्थान पर जाकर बैठ गया मानो कुछ हुआ ही नहीं हो ।

गर्म-गर्म विष्ठा के मुंह में गिरने से शिकारी हड़बड़ा कर अचानक उठ बैठा। झुंझलाते हुआ उसने इधर-उधर देखा। ज्योंही उसने पेड़ के ऊपर की ओर देखा तो बगुले अपना पंख फैलाकर बैठा देखा। बगुला कौवे की करतूत से अनजान था और अभी भी उसने पंख फैला रखे थे। उसे शिकारी के उठने का भी पता नहीं चला। शिकारी ने समझा कि बगुले ने ही उसके मुंह में विष्ठा करी है। क्रोध् में आकर उसने अपना तीर-धनुष उठाया और बगुले पर निशाना साधकर तीर छोड़ दिया। पलभर में भला करने वाला बगुला अपनी जान से हाथ धो बैठा।

शिक्षाः दुष्टात्माओं का साथ विनाश को निमंत्रण देना है।

चतुर लोमड़ी और मूर्ख बकरी

काफी पुरानी बात -स्पीडी नामक एक लोमड़ी घने जंगल में रहती थी। एक दिन उसने बहुत मांस खा लिया। ऐसे में उसे प्यास लगने लगी। जब वह पानी की तलाश में निकली, तो उसे एक कुआं दिखाई दिया। वह कुएं में झांकने लगी। तभी अचानक उसका पैर लड़खड़ाया और वह कुएं में जा गिरी। लोमड़ी सोचने लगी, ‘मैं तो कुएं में गिर गई। मुझे जल्दी से बाहर निकलना होगा, वरना इस ठंड में मेरे हाथ-पैर अकड़ जाएंगे।’ लोमड़ी यह सब सोच ही रही थी कि एक बकरी ने कुएं में झांककर देखा ।

तब लोमड़ी जोर से बोली, “बहन! तुम भी इस कुएं का पानी पी लो। यह बहुत मीठा है। ” बकरी ने पूछा, “क्या सचमुच बहुत मीठा है ? “

लोमड़ी बोली, “हां, तुम जल्दी से कुएं में कूद जाओ। मैं तुम्हें बाद में बाहर निकाल लूंगी।”

ज्यों ही बकरी कुएं में कूदी, त्यों ही लोमड़ी उस पर पांव रखकर चढ़ी और कुएं से बाहर निकलकर भाग गई। मूर्ख बकरी कुएं में खड़ी कांपती रह गई।

तीतर और समुद्र

किसी समय की बात है… किसी समुद्र के किनारे एक वृक्ष पर तीतर का जोड़ा रहता था। मादा तीतर समुद्र की ऊँची लहरों से सदा भयभीत रहती थी कि न जाने कब ये लहरें उसके घोंसले को बहा ले जाएं। थोड़े दिनों बाद उसके परिवार में नया मेहमान आने वाला था… वह अंडे देने वाली थी । भीतर से भयभीत तीतरी ने अपने मन की बात अपने पति तीतर को बताने का निर्णय किया। उसने तीतर से कहा, “प्रिय! मुझे लगता है कि हमें एक नई सुरक्षित जगह ढूँढकर अपना घोंसला बनाना चाहिए | “

तीतर ने तीतरी से पूछा, “क्यों प्रिय? यह तो अच्छी और शांत जगह है। समुद्रदेव हमारे घोंसले की रक्षा भी करेंगे।’

तीतरी ने उत्तर दिया, “प्रिय ! वही तो समस्या है। पूर्णिमा के दिन समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठेंगी और संभव है कि लहरें पेड़ की ऊँचाइयों को भी छू लें। यदि मैं अंडे दूँगी तो संभव है कि ऊँची लहरें अपने साथ हमारे घोंसले और अंडों को भी बहा ले जाएं। चलो, हम लोग कोई दूसरी जगह ढूँढते हैं।”

तीतर ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “प्रिय ! मुझे नहीं लगता है कि समुद्र इतना बलशाली है कि वह इतने ऊँचे हमारे घोंसले तक पहुँच जाए। तुम आराम से बेहिचक यहीं पर अंडा दे सकती हो । ”

समुद्र उनकी बातें सुन रहा था। उसका घमण्ड उठा। उसने सोचा, “उस पक्षी की मुझे कम शक्तिशाली समझने की हिम्मत कैसे हुई? क्या वह नहीं जानता है कि मैं पूरे संसार पर विजय प्राप्त कर उसे निगल सकता हूँ? ठहरो, अभी मैं अपनी शक्ति दिखाता हूँ…।”

इधर तीतर तीतरी को आश्वस्त करने में सफल हो गया। और तीतरी ने घोंसले में अंडे दे दिए थोड़े समय के बाद दोनों खाना ढूँढने चले गए। समुद्र ताक में था। उसने तीतर जोड़े को अंडों को छोड़कर जाता देखा तो सोचा कि अपनी शक्ति दिखाने का यह सही अवसर है। उसने एक बड़ी सी लहर पेड़ की ओर भेजी। वह लहर पेड़ को ही डुबोती चली गई और अपने साथ घोंसले तथा अंडों को बहा ले गई।

तीतर जोड़े ने वापस आने पर अपने घोंसले और अंडे को गायब पाया तो सकते में आ गए। तीतरी ने रोते हुए कहा, “मैंने कहा था न कि समुद्र बहुत बलशाली है… देखो, वह हमारे अंडे बहा ले गया। यदि तुमने मेरी बात मानकर कहीं और घोंसला बना दिया होता तो आज हमारा अंडा हमसे छिना नहीं होता।

असहाय सा महसूस करता हुआ तीतर बोला, “प्रिय ! चिंता मत करो। मैंने समुद्र की शक्ति को कम आंका। मैं यह नहीं समझ पाया था कि यह हमारे जीवन को ही बर्बाद कर देगा । पर मैं भी हार नहीं मानूँगा… मैं भी समुद्र को दिखा दूँगा। मुझे जरा अपने राजा गरुड़ से बात करने दो। “

तीतर जोड़े की व्यथा सुनकर गरुड़ ने कहा, “मै समुद्र की शक्ति को जानता हूँ पर मैं उसे हरा नहीं सकता। सृष्टि के रचयिता, भगवान विष्णु ही मात्र उससे लड़ सकते हैं और उसे हरा सकते हैं। चलो, उनसे ही इस समस्या का समाधान

पूछते हैं।” गरुड़ और तीतर साथ-साथ भगवान विष्णु के पास गए और उनसे अपनी समस्या बताई।

विष्णु भगवान ने कहा, ” चिंता मत करो मेरे बच्चों! मैं समुद्र और उसके अहंकार से परिचित हूँ। वह स्वयं को सर्वशक्तिमान सिद्ध करना चाहता है। मैं उसे अभी सबक सिखाता हूँ, आओ मेरे साथ…।”

विष्णु भगवान ने समुद्र के किनारे पहुँचकर आवाज दी, ने “अहंकारी समुद्र! क्या समझ रखा है तुमने स्वयं को ? स्वयं को सर्वशक्तिमान समझते हो ? यह मत भूलो कि मैंने ही तुम्हारी सृष्टि की है और पल भर में मैं तुम्हें नष्ट भी कर सकता हूँ। इस पक्षी के अंडे वापस करो अन्यथा मैं तुम्हें सो लूंगा।”

भयभीत समुद्र ने तुरंत बाहर आकर हाथ जोड़कर वि ने निवेदन किया, “क्षमा करें प्रभु ! मुझे अपनी भूल का एहसास हो गया है। कृपया मुझे शापित मत करें। मैं इनके अंडे लौटा दूँगा और वचन देता हूँ कि आगे से किसी को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।” समुद्र ने अंडे वापस लौटा दिए । तीतर अपने अंडे लेकर चला गया। उसने पेड़ पर अपना नया घोंसला बना लिया। तत्पश्चात् वे निर्भय होकर खुशी-खुशी वहाँ रहने लगे।

शिक्षाः अगले की शक्ति का अंदाजा लगाकर ही उससे युद्ध करना चाहिए ।

 

 

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