Hindi Story of Tenali Rama

चतुर व्यापारी-Hindi Story of Tenali Rama

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राजा कृष्णदेव राय को तेनालीराम से पहेलियां पूछने में बहुत आनन्द आता था। एक दिन राजा ने तेनालीराम से पूछा, “तेनाली, किस जाति के लोग सबसे चतुर होते हैं और कौन सबसे मूर्ख ?”

तेनालीराम पलभर के लिए सोचकर बोला, “महाराज, व्यापारी वर्ग सबसे चतुर होता है और ब्राह्मण वर्ग सबसे मूर्ख।”

राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। ब्राह्मण तो सबसे अधिक पढ़े लिखे और बुद्धिमान होते हैं, फिर भला वे सबसे मूर्ख कैसे हो सकते हैं? उन्होंने कहा, “क्या तुम इसे साबित कर सकते हो ?”

तेनालीराम ने कहा कि वह इस बात को साबित कर सकता है। उसने राजपुरोहित को बुलवाया और कहा, “बुद्धिमान व्यक्ति, राजा की इच्छा है कि आप अपनी चोटी मुंडवा दें।”

तेनालीराम की बात सुनकर राजपुरोहित सकते में आ गया। उसने कहा, “चोटी तो हिन्दुओं का गर्व होता है। मैंने वर्षों से इसे संभालकर रखा है। इस पर मुझे गर्व है। फिर भी आपकी इच्छा है तो मैं इसे मुंडवा तो लूंगा, पर इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा ?”

राजा ने कहा, “जितना चाहो उतना धन दूंगा।” तब राजपुरोहित ने पांच स्वर्ण मुद्राओं के बदले अपनी चोटी मुंडवा ली और दरबार से चले गए। तेनालीराम ने अब शहर के सबसे अमीर व्यापारी को बुलवाया। उसे जब राजा की इच्छा बताई तो वह बोला “ मैं अपनी चोटी तो मुंडवा लूंगा, पर मैं ठहरा गरीब आदमी। जब मेरे भाई की शादी हुई तो अपनी चोटी के लिए मैंने पांच हजार स्वर्ण मुद्राएं खर्च की थी । जब मेरी पुत्री का विवाह हुआ तो मुझे दस हजार स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ीं। अपनी इस चोटी को बचाना मुझे बहुत मंहगा पड़ा है। “

तब राजा ने कहा, “तुम अपनी चोटी मुंडवा लो, तुम्हारा सारा घाटा पूरा कर दिया जाएगा।

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अमीर व्यापारी को पन्द्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं दे दी गईं। नाई जब उसकी चोटी काटने के लिए बढ़ा, तो व्यापारी ने कहा, “देखो भाई, अब यह चोटी मेरी नहीं है। यह राजा की है ।

बहुत सावधानी से मूंडना मूंडते समय यह जरूर याद रखना कि यह राजा की चोटी है।”

राजा कृष्णदेव यह सुनकर आगबबूला हो गए और बोले, “ तुम्हारी यह कहने की हिम्मत कैसे हुई ? क्या मैं पागल हो गया हूं, जो मैं अपनी चोटी मुंडवाऊंगा?” राजा ने सिपाहियों को व्यापारी को बाहर निकालने का आदेश दे दिया।

तेनालीराम मुस्कराया। राजा का क्रोध शांत होने पर उस कहा, “महाराज, क्या आपने देखा….. किस तरह व्यापारी ने पन्द्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं आपसे ले लीं और अपनी चोटी भी सुरक्षित रख ली, जबकि ब्राह्मण ने चोटी मुंडवा ली और वह भी पांच स्वर्ण मुद्राओं में। “

राजा कृष्णदेव राय तेनालीराम के बुद्धिमानी की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सके।

 

 

सपनों का महल-Hindi Story of Tenali Rama

Hindi Story of Tenali Rama सपनों का महल तेनाली रामा के किस्से

एक बार चांदनी रात में राजा कृष्णदेव राय अपने महल के छज्जे पर ठंडी हवा के झोंके ले रहे थे। ऐसे में राजा को छज्जे पर बैठना बहुत अच्छा लग रहा था। थोड़ी ही देर में उनकी आंख लग गई और वे सपनों की दुनिया में चले गए।

सपने में उन्होंने एक जादुई महल देखा जो हवा में उड़ रहा था। संगमरमरी दीवारों पर रंग-बिरंगे पत्थर लगे थे और उसमें ऐशो-आराम की सारी व्यवस्था थी । हवा में तैरता हुआ वह महल दूर से चांद की तरह लग रहा था ।

सुबह होने पर भी राजा सपनों की दुनिया से बाहर नहीं निकल पाए । अब उन्हें वैसा ही महल चाहिए था। चिंता के कारण वह बीमार पड़ गए। उन्होंने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि, “जो भी राजा के सपने का महल बनाने में सफल होगा, उसे राजा की ओर से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दी जाएंगी। घोषणा सुनकर सभी जानना चाहते थे कि जादुई महल क्या है, कैसा है?

कोई कहता “क्या राजा पागल हो गए हैं……. कुछ लालची लोग राजा को मूर्ख बनाकर धन लेने के लिए झूठी आशा भी देने लगे। इस सब में महीना गुजर गया। राजा

सारे काम छोड़कर सिर्फ अपने सपने के महल के बारे में सोचते रहते। सभी दरबारी भी परेशान हो गए थे हारकर दरबारियों ने तेनालीराम से सलाह मांगी।

तेनालीराम ने एक योजना बनाई। उसने राजा से कुछ दिनों की छुट्टी मांगी, जिसे राजा ने स्वीकार कर लिया। कुछ दिन बीत गए एक दिन अचानक दरबार में एक बूढ़ा आदमी दौड़ता हुआ आया और राजा के पैरों पर गिरकर, गिड़गिड़ाता हुआ बोला, “महाराज, मुझे बचाइये, मेरा परिवार भूख से मर जाएगा।

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राजा ने उसे उठाया और उससे सारी बात पूछी। वह बूढ़ा सिसकता हुआ बोलने लगा, “मैं लुट गया हूं। मैंने अपनी पुत्री के विवाह के लिए कुछ पैसे बचाए थे, पर वे पैसे चले गए । अब मेरी पुत्री का विवाह कैसे होगा? मैं अपने परिवार का पेट कैसे भरूंगा…. सब कुछ खत्म हो गया….।”

राजा ने अपने सेवकों से कहा, “पता करो कि किसने इसे लूटा है ? “

यह सुनकर बूढ़ा तुरंत बोला, “ हुजूर, आपने मुझे लूटा है। “

“मैंने ! मूर्ख, मैं तुम्हारा राजा हूं। थोड़े से पैसे के लिए मैं तुम्हें लूंटगा.. .!” परेशान होते हुए राजा ने कहा । बूढ़े ने कहा, “कल रात मैंने सपना देखा कि आप अपने सेवकों के साथ मेरे घर आकर जबरदस्ती सब लूटकर ले गए हैं। मैं बहुत गरीब हूं हुजूर.. .थोड़ी तो दया कीजिए..

क्रोध से राजा बोला, “तुम पागल तो नहीं हो ? सपने भी सच होते हैं क्या?”

बूढ़े आदमी ने कहा, “क्यों हुजूर, अगर आपका उड़ने वा महल का सपना सच हो सकता है, तो मेरा सपना सच क्यों नहीं हो सकता…. .?”

राजा आश्चर्यचकित रह गया। उसने शर्मिंदा होकर बूढ़े आदमी को धन्यवाद किया।

बूढ़े आदमी ने धीरे से अपनी दाढ़ी मूछें उतार दीं और राजा का अभिवादन किया। वह बूढ़ा और कोई नहीं खुद तेनालीराम था तेनालीराम की चतुराई देखकर पूरा ब तालियों से गूंज उठा।

 

अनोखा वैवाहिक निमंत्रण-Hindi Story of Tenali Rama

Hindi Story of Tenali Rama अनोखा वैवाहिक निमंत्रण तेनाली रामा के किस्से

एक समय की बात है, विजयनगर पर राजा कृष्णदेव राय का शासन था तथा दिल्ली पर सुलतान आदिलशाह का। सुलतान आदिलशाह कृष्ण देव के प्रति शत्रुता का भाव रखते थे। वे युद्ध का बहाना ढूंढ़ते रहते थे। एक बार उन्होंने एक योजना बनाई ।

सुबह का समय था, विजयनगर में दरबार सजा हुआ था । तभी दिल्ली का एक दूत राजा के पास विवाह का निमंत्रण लेकर आया । निमंत्रण पत्र पढ़ते ही भय और चिंता से राजा की आंखें खुली की खुली रह गयीं । निमंत्रण कुछ इस प्रकार था – हमारे यहां एक नए कुएं का विवाह सम्पन्न होने जा रहा है। इस समारोह के लिए विजयनगर के सभी कुएं सप्रेम आमंत्रित हैं। यदि आप अपने कुओं को भेजने में असमर्थ हैं, तो दिल्ली इस बात का बुरा मानेगी तथा इसका अंजाम आपको भुगतना पड़ेगा।

शांतिप्रिय राजा युद्ध नहीं चाहते थे। पर भला वे कुओं को फैसे भेजते.. .कृष्णदेव ने तेनालीराम को बुलाकर अपनी समस्या बताई और कोई समाधान निकालने के लिए कहा।

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तेनालीराम निमंत्रण हंसता हुआ पत्र पढ़कर बोला, “सुलतान मजाक अच्छा कर लेते हैं। आप चिंतित न हों महाराज, मैं इसका उत्तर दूंगा । “अगले दिन तेनालीराम एक पत्र लेकर आया। पत्र में लिखा था

सेवा में,

दिल्ली के सुलतान,

महाराज,

आपकी दयालुता है कि आपने अपने कुएं के विवाह का निमंत्रण हमारे कुओं को भेजा है। हम लोग इस निमंत्रण को पाकर बहुत प्रसन्न और आभारी हैं। आपका निमंत्रण हमने अपने राज्य के कुओं को पहुंचा दिया है। उन्होंने कहा है, क्योंकि आपके राज्य के कुएं हमारे राज्य के कुओं के विवाह में सम्मिलित नहीं हुए थे, इसलिए हम भी नहीं आना चाहते हैं।

फिर भी हम लोगों का यह सुझाव है कि यदि व्यक्ति रूप से आपके कुएं विजयनगर आकर हमारे कुओं को निमंत्रित करें, तो निश्चित रूप से हमारे कुएं निमंत्रण को स्वीकार करेंगे। इसलिए यदि आप अपने कुओं को विवाह का निमंत्रण लेकर हमारे कुओं के पास भेज दें, तो हमारे लिए बहुत सम्मान की बात होगी। एक बार आपके कुएं यहां आ जाएं, तब हमारे कुएं और हम सब भी जरूर विवाह में सम्मिलित होने दिल्ली आएंगे।

आपके कुओं की प्रतीक्षा में..

पत्र सुनकर राजा कृष्णदेव ने चैन की सांस ली । दूत के द्वारा पत्र का उत्तर दिल्ली भेज दिया गया। दरबार तेनालीराम की जय-जयकार से गूंज उठा।

सुलतान आदिलशाह अपने पत्र का उत्तर पाकर समझ गए कि उनसे गलती हुई है।

विजयनगर के प्रति शत्रुता का भाव त्याग दिया। उन्होंने मन ही मन यह निश्चय भी किया कि अब कभी राजा कृष्णदेव राय के प्रति ऐसा दांव नहीं चलेंगे।

ईमानदार कौन ?-Hindi Story of Tenali Rama

Hindi Story of Tenali Rama अनोखा वैवाहिक निमंत्रण तेनाली रामा के किस्से 1

राजा कृष्णदेव राय एक दिन अपने दरबार में बैठे थे। उन्होंने पूछा, “अमीर और गरीब के बीच कौन अधिक ईमानदार है। “

राजगुरु ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “महाराज, अमीर आदमी ही अधिक ईमानदार होगा।” वह अमीर तो है ही, फिर थोड़े से धन के लिए वह बेइमानी क्यों करेगा ?”

राजगुरु के उत्तर से राजा संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने तेनालीराम से पूछा । तेनालीराम ने कहा, “महाराज मेरा विचार थोड़ा अलग है। मेरे विचार से एक गरीब आदमी एक अमीर आदमी से अधिक ईमानदार होता  है”

राजा ने तेनालीराम को उसकी बात को सिद्ध करने के लिए। कहा। तेनालीराम ने थोड़ा समय तथा स्वर्ण अशर्फियों से भरा हुआ एक थैला मांगा।

राजा से स्वर्ण अशर्फियां लेकर तेनालीराम ने उसे दो छोटे थैलों में डाल दिया और जिस रास्ते से शहर का अमीर आदमी प्रतिदिन नदी पर स्नान के लिए जाता था, उस रास्ते पर एक थैला तेनालीराम ने रख दिया। स्नान के लिए जाते समय अमीर आदमी ने थैला देखकर गाड़ी रोकी और थैला उठा लिया। उसने थैला खोला तो उसमें स्वर्ण अशर्फियां थीं। लक्ष्मी मां की कृपा मानकर उसने चुपचाप थैल लिया। तेनालीराम एक पेड़ के पीछे छुपा सब देख रहा था अगले दिन उसने दूसरा थैला उसने गरीब आदमी के खेत जाने वाले रास्ते में रख दिया।

गरीब आदमी ने थैला खोला, तो उसमें स्वर्ण अशर्फियों को देखकर सोचा ” जरूर ही यह किसी की मेहनत की कमाई है, जो गिर गई है। कुछ भी करके मुझे इस थैले को उस आदमी तक पहुंचाना होगा। गरीबी के दिन बहुत बुरे होते हैं और मैं नहीं चाहता हूं कि उस आदमी को बुरे दिन देखने पड़ें…

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वह गरीब आदमी स्वर्ण अशर्फियों का थैला लेकर शाही खजांची के पास गया और वहां उसे जमा करा दिया। तेनालीराम सब कुछ छुपकर देख रहा था। गरीब आदमी के व्यवहार से वह बहुत संतुष्ट हुआ।

दरबार में आकर उसने राजा को सारी बात बताई। राजा ने अमीर तथा गरीब आदमियों को बुलवाया। उन्होंने ब आदमी को पुरस्कार दिया तथा अमीर व्यक्ति को दंड दिया और साथ ही उसे जुर्माना भी भरना पड़ा ।एक बार फिर से राजा ने तथा सभी दरबारियों ने तेनालीराम की चतुराई की प्रशंसा करी ।

 

सबसे बड़ा मूर्ख-Hindi Story of Tenali Rama

Hindi Story of Tenali Rama सबसे बड़ा मूर्ख तेनाली रामा के किस्से

विजय नगर के राजा कृष्णदेव राय को घोड़ों का बहुत शौक था। एक दिन एक अरबी घोड़ों का व्यापारी राजा के पास पहुंचा और कहा, “महाराज, मैं अपने देश से कुछ घोड़े लाया हूं। क्या आप उन्हें खरीदना चाहेंगे?”

राजा को एक तगड़ा घोड़ा दिखा, जो खुद व्यापारी का था। राजा ने जानना चाहा कि व्यापारी के पास किस तरह के घोड़े हैं। व्यापारी ने कहा, “महाराज, मैं बीस घोड़ों को बेचने के लिए लाया हूं। उनमें से सबसे अच्छी नस्ल और मजबूत कदकाठी वाला आपके सामने है। सिर्फ एक नमूने के रूप में मैं लाया हूं, क्योंकि सभी बीस घोड़ों को विजयनगर लाना मुश्किल था । अगर आपको यह पसंद है, तो मैं सभी बीस घोड़े आपको पांच हजार सोने के सिक्कों में बेच सकता हूं।

राजा बहुत खुश हुए । वास्तव में उन्हें वह घोड़ा पसंद आ गया था। उन्होंने सोचा, “क्या अद्भुत दृश्य होगा, जब बी के बीस घोड़े मेरे पास होगें । मेरा अस्तबल पूरे देश में सबसे अच्छा अस्तबल हो जाएगा। ” इसलिए वह व्यापारी के प्रस्ताव पर सहमत हो गए। लेकिन व्यापारी ने कहा, “एक बात है, मैं चाहूंगा कि आप मुझे सारी राशि अभी दे दें। मैं उस पैसे के बदले में बाकी के बीस घोड़े जल्दी ही लेकर आ जाऊंगा, यह मेरा वादा है। ” हालांकि राजा इस बात के लिए राजी नहीं थे, लेकिन उन्होंने उस आदमी को पूरी राशि पहले दे दी व्यापारी ने वह राशि ली और चलता बना

उसके बाद बहुत महीने बीत गए और अरबी व्यापारी का कोई भी अता-पता नहीं चला। राजा अधीर हो गए। एक दिन जब वह अपने महल के चारों ओर घूमते हुए बगीचे में टहल रहे थे, तब उन्होंने देखा कि तेनालीराम एक कागज के टुकड़े पर कुछ लिख रहा है ।

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राजा ने पूछा, “आप क्या लिख रहे हैं?” तेनालीराम ने कहा, “महाराज, मैं अपने नगर के मूर्खों की सूची बना रहा हूं। ” राजा ने कहा, “मुझे भी दिखाओ। ” तेनालीराम ने उत्तर दिया, “मैं क्षमा चाहता हूं महाराज, मैं इसे आपको

नहीं दिखा सकता हूं। ” राजा ने पूछा, “क्यों?” तेनाली चुप ही रहा। राजा ने कागज उसके हाथ से छीन लिया।

वह सूची पढ़ते ही चैंक गये और क्रोध में आकर चिल्लाए, “तेनालीराम, तुम्हारी इतनी हिम्मत ? अपने राजा के नाम को इस सूची में सबसे ऊपर दिखाने की तुमने हिम्मत कैसे की?”

तेनालीराम ने शांति से जवाब देते हुए कहा, ” क्योंकि महाराज, एक अजनबी को पांच हजार सोने के सिक्के देकर उसके वापिस आने की आशा करने वाला महामूर्ख ही माना जाएगा।”

राजा ने कहा, “तुम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हो कि वह वापस नहीं आएगा? और अगर वह वापस आएगा, तो ?”

तेनालीराम ने कहा, “तो महाराज, मैं आपका नाम सूची से निकाल दूंगा और उसका नाम लिख दूंगा।”

राजा ने तेनालीराम से आगे प्रश्न नहीं किया। उन्होने सूची को वापिस तेनालीराम को सौंप दिया और बगीचे से दूर चले गये।

काशी का विद्वान-Hindi Story of Tenali Rama

Hindi Story of Tenali Rama काशी का विद्वान तेनाली रामा के किस्से

एक बार राजा कृष्णदेव राय के दरबार में काशी के एक प्रसिद्ध विद्वान आए। उन्होंने भारत भ्रमण किया हुआ था और कई विषयों में पारंगत थे। उन्हें दूसरे विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ में बहुत आनंद आता था। साथ ही उन्हें इस बात का घमंड भी था कि कोई उन्हें हरा नहीं सकता।

राजा ने उनका भव्य स्वागत किया और आदरपूर्वक अपने महल में रुकने का अनुरोध किया। राजा का अनुरोध स्वीकार कर वे एक महीने तक महल में रुके । पर शीघ्र ही बिना किसी चर्चा के वे ऊबने लगे और उन्होंने राजा से कहा, “महाराज, मैंने सुना है कि आपके दरबार में बहुत सारे विद्वान हैं। मैं उनके साथ शास्त्रार्थ करना चाहता हूं। यदि मैं हारूंगा तो अपनी सारी उपाधि दे दूंगा और अगर जीतूंगा तो उन लोगों को मुझे अपना गुरु मानना पड़ेगा।”

राजा हैरान थे। उन्होंने अपने अष्ट दिग्गजों को बुलवाया। उनमें से सात आए पर वे भी विद्वान के प्रस्ताव से परेशान थे। कोई भी इस चुनौती को स्वीकार नहीं करना चाहता था।

राजा ने तेनालीराम को बुलवाया। वह अपने बगीचे में पौधों की देखभाल कर रहे थे, वे भागे-भागे दरबार में उपस्थित हुए। राजा ने जब तेनालीराम से शास्त्रार्थ में शामिल होने के लिए कहा, तो तेनाली ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

काशी के विद्वान अगले दिन सफेद सिल्क की धोती पहने, अपने पदकों से सजकर दरबार में पहुंचे। प्रतियोगिता की सारी तैयारी हो चुकी थीं। उन्होंने अपनी पैनी नजर अपने प्रतियोगियों पर डाली।

सातों विद्वानों ने तेनालीराम का यश गीत गाते हुए दरबार में प्रवेश किया। उनके पीछे तेनालीराम था। उसने सिल्क की सफेद धोती तथा जरी वाला शॉल ओढ़ रखा था। गले में कीमती रत्न जड़ित पदक, माथे पर लाल तिलक तथा हाथ में सुंदर कपड़े में मढ़ा हुआ एक मोटा सा ग्रंथ था। उसके कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। सेवक सोने की ईंट रखता था फिर तेनालीराम उस पर अपने पैर रखता था

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काशी का विद्वान इस दृश्य को देखता ही रह गया। तेनालीराम ने अपना आसन ग्रहण किया, ग्रंथ खोला और गर्वीले स्वर में पूछा, “वह कौन विद्वान है जो मुझसे शास्त्रार्थ करना चाहता है ? “

काशी के विद्वान को तेनालीराम का रूप देखकर एक झटका सा लगा, पर ऊपर से शांत भाव खड़े होकर बोला, “मैं हूं वह विद्वान । ”

राजा ने शास्त्रार्थ प्रारम्भ करने का आदेश दिया। तेनालीराम ने अपने साथ लाए ग्रंथ पर काशी के विद्वान को शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया। विद्वान ने पूछा, “क्या मैं जान सकता हूं यह कौन सा ग्रंथ है?”

तिलाकाष्ठमहिषंबधन”, तेनालीराम ने कहा।

काशी के विद्वान ने इस ग्रंथ के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। उसने सोचा, “मैंने इस ग्रंथ के बारे में कभी सुना ही नहीं है, इसलिए मुझे इस शास्त्रार्थ से दूर ही रहना चाहिए। वैसे भी इस व्यक्ति को देखकर लगता है कि यह मुझे आसानी से हरा देगा । ” आदरपूर्वक राजा का अभिवादन कर उसने कहा, “महाराज, मुझे अच्छी तरह से याद है, मैंने काफी समय पहले इस ग्रंथ का अध्ययन किया था। कृपया मुझे शास्त्रार्थ के लिए एक दिन का समय दीजिए ताकि मैं अपनी धूल झाड़ सकूं।” राजा ने अपनी स्वीकृति दे दी और काशी के विद्वान अपने कमरे में लौट गये।

उन्होंने शीघ्रतापूर्वक अपना सामान समेटा और रात अपने शिष्यों के साथ चुपचाप महल छोड़कर चलते बने।

अगले दिन यह समाचार सुनकर राजा आश्चर्यमिश्रित हंसी हंसने लगे। उन्होंने तेनालीराम को इस शुभ समाचार को देने के लिए बुलवाया। तेनालीराम के आने पर राजा ने पूछा, “वह कौन सा ग्रंथ था, जिसने विद्वान को इतना भयभीत कर दिया?”

तेनालीराम ने कहा, “महाराज कोई ग्रंथ नहीं था। एक खाली पुस्तिका  थी। जिस पर मैंने सिल्क की जिल्द लगा दी थी । ”

राजा ने कहा, , “अच्छा तो तुमने विद्वान से झूठ कहा । तुम्हारे जैसे विद्वान को यह शोभा नहीं देता है। “

“महाराज, मैंने कोई झूठ नहीं कहा है। देखिए, यह ि के पौधे की शाखा है इस पर मैंने भैंस के गले में बांधने वाली रस्सी बांध रखी है, “अपने पुस्तक एक बंधी हुई से शाखा निकालकर दिखाते हुए तेनालीराम ने आगे कहा, “ संस्कृत में ‘तिला’ का अर्थ होता है तिल, ‘काष्ठा’ अर्थात् लकड़ी, ‘महिष’ अर्थात् भैंस और ‘बंधन’ जो उसे बांधता है, इसीलिए मैंने इसे तिलाकाष्ठमहिषंबधन कहा था । राजा जोर जोर से हंसने लगे। हंसते-हंसते वे बोले, “उस विद्वान को तुमने अच्छा पाठ पढ़ाया है। ” तेनालीराम को उसकी चतुराई के लिए राजा ने पुरस्कृत किया ।

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