5+ Stories For Kids In Hindi-क्रोध किसे हानि पहुंचाता है?

क्रोध किसे हानि पहुंचाता है?-Stories For Kids In Hindi

किसी गांव में अहम नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसे बहुत गुस्सा आता था वह जरा जरा सी बात पर क्रोधित हो जाता था। वह बहुत शिक्षित और उच्च पद पर आसीन था ।

उसके क्रोध को देखकर एक सज्जन ने उसे सुदर्शन ऋषि के आश्रम में जाने को कहा। अहम ने उस सज्जन की बात सुनते ही गुस्से से उसे देखा बोला- “क्या मैं पागल हूं जो ऋषि के आश्रम में जाऊं?, मैं तो सर्वश्रेष्ठ हूं और मेरे आगे कोई कुछ नहीं है।”

उसकी यह बात सुनकर सज्जन व्यक्ति वहां से चला गया। धीरे-धीरे सभी से अहम दूर-दूर रहने लगे उसे भी इस बात का एहसास हो गया था ।एक दिन वह बेहद क्रोध में सुदर्शन ऋषि के आश्रम  में जा पहुंचा। सुदर्शन ऋषि ने अहम के बारे में सुन रखा था उन्होंने उसके क्रोध दूर करने का विचार बनाया। वह जानबूझकर बोले- “कहो! नौजवान, कैसे हो तुम्हें देखकर प्रतीत होता है कि तुम दुर्गुण ही दुर्गुण से भरे हुए हो।”

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सुदर्शन ऋषि की बात सुनकर अहम को बेहद क्रोध आया। उसने अपनी मुठिया बंद कर ली और वहां मौजूद सभी को भला बुरा कहने लगा। उसके उल्टी सीधी बातें सुनकर आश्रम में भीड़ एकत्रित हो गई किंतु किसी ने कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बड़बड़ाकर वह थक हार कर बैठ गया, बेवजह बोल कर उसका सिर दर्द कर रहा था उसकी स्थिति देखकर सुदर्शन और क्या है “क्या तुम्हारे क्रोध से किसी को कोई हानि हुई?, अगर हुई है तो सबसे पहले तुम्हें।”तुम्हारे क्रोध ने पहले स्वयं एवं दूसरों से दूर कर दिया है, तुमअत्यंत ज्ञानी हो। अहम कोअपनी गलती का एहसास हो गया था,उसने अपने व्यक्तित्व में क्रोध को दूर करने का निश्चय कर लिया।

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चालाक और दुष्ट बिल्ली--Stories For Kids In Hindi

चालाक और दुष्ट बिल्ली-Stories For Kids In Hindi

बहुत समय पहले की बात है। एक जंगल में एक बहुत बड़ा पेड़ था। इस पेड़ की शाखाओं पर बहुत सारे पक्षी रहा करते थे। इस पेड़ की एक शाखा पर एक चिड़िया और एक कौवा भी रहते थे। दोनों ने अपने—अपने घोंसले बना रखे थे। एक दिन चिड़िया ने कौवे से कहा, ‘नजदीक में ही बहुत सारी फसल पककर तैयार हुई है। मैं उसकी दावत उड़ाने जा रही हूँ। तुम मेरे घर का खयाल रखना।’

कौवे ने कहा, ‘ठीक है।’ चिड़िया फुर्र से उड़ गई। शाम को कौवा चिड़िया का इंतजार करता रहा, पर चिड़िया नहीं आई। धीरे—धीरे कई दिन बीतने पर कौवे ने सोचा कि हो सकता है, चिड़िया को किसी ने पकड़ लिया हो। कौवे को अब उम्मीद नहीं थी कि चिड़िया वापस आ जाएगी। एक दिन एक खरगोश वहाँ से गुजर रहा था, तभी उसकी नजर उस खाली पड़े घोंसले पर पड़ी। अंदर जाकर देखा तो वहाँ कोई नहीं था।

खरगोश को यह घर पसंद आ गया और वह उसी में रहने लगा। कौवे ने भी कोई एतराज नहीं किया। बहुत दिन बीतने पर जब फसल खत्म हो गई तो चिड़िया वापस अपने घोंसले में आई। यहाँ आकर उसने देखा कि उसके घर में एक खरगोश रह रहा है। उसने खरगोश से कहा कि यह घर तो मेरा है। खरगोश ने कहा, ‘मैं यहाँ कई दिनों से रह रहा हूँ, इसलिए यह घर मेरा है। चिड़िया जब तक उड़नेवाली नहीं होती, तब तक ही घोंसले में रहती है।’

चिड़िया नहीं मानी। खरगोश भी नहीं माना। दोनों खूब जोर—जोर से लड़ने लगे। आखिर खरगोश ने कहा, ‘हमें किसी बुद्धिमान के पास जाकर अपना फैसला कराना चाहिए। जिसके हक में फैसला होगा, वह इसमें रहेगा, दूसरे को जाना पड़ेगा।’

इस बात को चिड़िया भी मान गई। इनकी इस लड़ाई को एक बिल्ली ने सुन लिया था। वह फटाफट एक माला हाथ में लेकर जोर-जोर से राम-राम रटने लगी। जैसे ही खरगोश की नजर उस पर पड़ी, उसने कहा, ‘वह देखो, वह बिल्ली राम-राम रट रही है, उसी से फैसला करवा लेते हैं।’

चिड़िया ने कहा, ‘यह हमारी पुरानी दुश्मन है, इसलिए इससे दूरी बनाकर ही बात करनी होगी।’ चिड़िया ने दूर से ही आवाज देकर कहा, ‘महाराज, हमारा एक फैसला करना है। ‘

बिल्ली ने आँख खोलते हुए कान पर हाथ रखकर कहा, ‘क्या कहा, जरा नजदीक आकर जोर से बोलो।’

चिड़िया ने जोर से कहा, ‘हमारा एक फैसला करना है, जिसकी जीत होगी, उसको छोड़ तुम दूसरे को खा लेना।’

बिल्ली ने कहा, ‘छि:, छिः… तुम ये कैसी बातें कर रही हो। मैंने तो शिकार करना कब का छोड़ दिया है। तुम निडर होकर नजदीक आकर मुझे सब बताओ, मैं फैसला कर दूंगी।’

खरगोश को उसकी बात पर भरोसा हो गया। वह बिल्ली के नजदीक गया तो बिल्ली बोली, ‘और नजदीक आओ, मेरे कान में सारी बात बताओ। खरगोश ने उसके कान में सारी कहानी कह दी। चिड़िया भी यह देखकर बिल्ली के पास पहुँच गई। मौका देखते ही बिल्ली ने झपटा मारकर दोनों को मार दिया और खा गई। पेट भर जाने के बाद बिल्ली खुद उनके घोंसले में गई और सो गई। इसलिए कहा गया है कि कभी भी अपने दुश्मन पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

ईश्वर और मोह-माया-Stories For Kids In Hindi

और मोह माया Stories For Kids In Hindi

किसी गाँव में एक धनी सेठ रहता था। उसके घर के पास जूते सिलनेवाले एक गरीब मोची की दुकान थी। उस मोची की एक खास आदत थी कि वह जब भी जूते सिलता तो भगवान् के भजन गुनगुनाता रहता था। लेकिन सेठ ने कभी उसके भजनों की तरफ ध्यान नहीं दिया। एक दिन सेठ व्यापार के सिलसिले में विदेश गया और घर लौटते वक्त उसकी तबीयत बहुत खराब हो गई।

लेकिन पैसे की कोई कमी तो थी नहीं सो देश–विदेशों से डॉक्टर, वैद्य, हकीमों को बुलाया गया, लेकिन कोई भी सेठ की बीमारी का इलाज नहीं कर सका। सेठ की तबीयत दिन-प्रतिदिन और खराब होती जा रही थी। वह चल-फिर भी नहीं पाता था, एक दिन वह घर में अपने बिस्तर पर लेटा था कि अचानक उसके कान में मोची के भजन की आवाज सुनाई दी। आज मोची के भजन उसे कुछ अच्छे लग रहे थे। कुछ ही देर में सेठ इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि उसे ऐसा लगा जैसे वो साक्षात् परमात्मा से मिलन कर रहा हो।किसी गाँव में एक धनी सेठ रहता था। उसके घर के पास जूते सिलनेवाले एक गरीब मोची की दुकान थी।

उस मोची की एक खास आदत थी कि वह जब भी जूते सिलता तो भगवान् के भजन गुनगुनाता रहता था। लेकिन सेठ ने कभी उसके भजनों की तरफ ध्यान नहीं दिया। एक दिन सेठ व्यापार के सिलसिले में विदेश गया और घर लौटते वक्त उसकी तबीयत बहुत खराब हो गई। लेकिन पैसे की कोई कमी तो थी नहीं सो देश

मोची के भजन सेठ को उसकी बीमारी से दूर लेते जा रहे थे। कुछ देर के लिए सेठ भूल गया कि वह बीमार है। उसे अपार आनंद की प्राप्ति हुई। कुछ दिन तक यही सिलसिला चलता रहा, अब धीरे धीरे सेठ के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा।

एक दिन उसने मोची को बुलाया और कहा, मेरी बीमारी का इलाज बड़े-बड़े डॉक्टर नहीं कर पाए, लेकिन तुम्हारे भजन ने मेरा स्वास्थ्य सुधार दिया, ये लो 2000 रुपए इनाम। मोची खुश होकर पैसे लेकर चला गया। लेकिन उस रात मोची को बिल्कुल नींद नहीं आई। वो सारी रात यही सोचता रहा कि इन पैसों को कहाँ छुपाकर रखूँ और इनसे क्या-क्या खरीदना है?

इसी सोच की वजह से वो इतना परेशान हुआ कि अगले दिन काम पर भी नहीं जा पाया। अब भजन गाना तो जैसे वो भूल ही गया था, मन में खुशी थी पैसे की। अब तो उसने काम पर जाना ही बंद कर दिया और धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी भी चौपट होने लगी।

इधर सेठ की बीमारी फिर से बढ़ती जा रही थी। एक दिन मोची सेठ के घर आया और बोला, ‘सेठजी आप अपने ये पैसे वापस रख लीजिए, इस धन की वजह से मेरा धंधा चौपट हो गया, मैं भजन गाना भूल गया।

इस धन ने तो मेरा परमात्मा से नाता ही तुड़वा दिया।’ मोची पैसे वापस करके फिर से अपने काम में लग गया। सचमुच पैसों का लालच हमको अपनों से दूर ले जाता है, हम भूल जाते हैं कि कोई ऐसी शक्ति भी है, जिसने हमें बनाया है।

भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता-Stories For Kids In Hindiसे अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता

एक सेठजी थे, जिनके पास काफी दौलत थी और सेठजी ने उस धन से निर्धनों की सहायता की, अनाथ आश्रम एवं धर्मशाला आदि बनवाए। इस दानशीलता के कारण सेठजी की नगर में काफी ख्याति थी। सेठजी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में की थी, परंतु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी, शराबी, सट्टेबाज निकल गया, जिससे सब धन समाप्त हो गया।

बेटी की यह हालत देखकर सेठानीजी रोज सेठजी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो, मगर अपनी बेटी की परेशानी में भी उसकी मदद क्यों नहीं करते हो? सेठजी कहते कि भाग्यवान जब तक बेटी-दामाद का भाग्य उदय नहीं होगा, तब तक मैं उनकी कितनी भी मदद करूँ, कोई फायदा नहीं होगा। जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद करने को तैयार हो जाएँगे। परंतु माँ तो माँ होती है, बेटी परेशानी में हो तो माँ को कैसे चैन आएगा। सोच-विचार में सेठानी रहती थी कि किस तरह बेटी की आर्थिक मदद करूँ।

एक दिन सेठजी घर से बाहर गए थे कि तभी उनका दामाद घर आ गया। सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया कि क्यों न मोतीचूर के लड्डुओं में अशर्फियाँ रख दी जाएँ, जिससे बेटी की मदद भी हो जाएगी और दामाद को पता भी नहीं चलेगा। यह सोचकर सास ने लड्डुओं के बीच में अशर्फियाँ दबाकर रख दीं और दामाद को विदा कर दिया।

दामाद लड्डू लेकर घर से चला। दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर जाए, क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच दिए जाएँ। और दामाद ने लड्डुओं का टोकरा मिठाईवाले को बेच दिया और पैसे जेब में डालकर चला गया।
उधर सेठजी बाहर से आए तो उन्होंने सोचा घर के लिए मिठाई लेता चलूँ। उन्होंने दुकानदार से लड्डू माँगे। मिठाईवाले ने वही लड्डू का टोकरा सेठजी को वापस बेच दिया, जो उनके दामाद को उसकी सास ने दिया था।

सेठानी ने जब लड्डुओं का वही टोकरा देखा तो अपना माथा पीट लिया। उसने दामाद के आने से लेकर लड्डुओं में अशर्फियाँ छिपाने तक की बात सेठजी से कह डाली।

सेठजी बोले, ‘भाग्यवान, मैंने पहले ही समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं जगा है। देखा अशर्फियाँ न तो दामाद के भाग्य में थीं और न ही मिठाईवाले के भाग्य में इसलिए कहते हैं कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता।

सच्चे आनंद की प्राप्ति-Stories For Kids In Hindiआनंद की प्राप्ति short stories in hindi

एक बार एक स्वामीजी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगाई, ‘भिक्षा दे दे माते। ‘घर से महिला बाहर आई। उसने उनकी झोली में भिक्षा डाली और कहा, ‘महात्माजी, कोई उपदेश दीजिए ‘ स्वामीजी बोले, ‘आज नहीं, कल दूँगा।’
दूसरे दिन स्वामीजी ने पुनः उस घर के सामने आवाज दी, ‘भिक्षा दे दे माते।’

उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनाई थी, जिसमें बादाम-पिस्ते भी डाले थे, वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आई। स्वामीजी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने लगी तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, ‘महाराज, यह कमंडल तो गंदा है।’
स्वामीजी बोले, ‘हाँ, गंदा तो है, किंतु खीर इसमें डाल दो।’

स्त्री बोली, ‘नहीं महाराज, तब तो खीर खराब हो जाएगी। दीजिए, यह कमंडल, मैं इसे शुद्ध कर लाती हूँ।’

स्वामीजी बोले, ‘मतलब जब यह कमंडल साफ हो जाएगा, तभी खीर डालोगी न?” स्त्री ने कहा, ‘जी महाराज।’

स्वामीजी बोले, ‘मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिंताओं का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्कारों का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा।’

यदि उपदेशामृत पान करना है, तो सबसे पहले अपने मन को शुद्ध करना चाहिए। कुसंस्कारों का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनंद की प्राप्ति होती है

फूल और पत्ते की कहानी-Stories For Kids In Hindi

और पत्ते की कहानी short stories fir kids in hindi

किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था। तालाब के पास एक बागीचा था, जिसमें अनेक प्रकार के पेड़-पौधे लगे थे। दूर-दूर से लोग वहाँ आते और बागीचे की तारीफ करते। गुलाब के पेड़ पर लगा एक पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता कि हो सकता है, एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे। पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा।

उसके अंदर तरह-तरह के विचार आने लगे, ‘सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते, पर मुझे कोई देखता तक नहीं। शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं, कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं।’ और यह विचार कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा।

दिन यूँ ही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आँधी का रूप ले लिया। बागीचे के पेड़
पौधे तहस-नहस होने लगे, सभी फूल जमीन पर गिरकर निढाल हो गए, वह पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा।

पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूरी पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंकों की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी। वह प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि तभी पत्ते ने उसे आवाज दी, ‘घबराओ नहीं नन्ही, आओ, मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ।’

और ऐसा कहते हुए पत्ते ने उसे अपने ऊपर बैठा लिया। आँधी रुकते- रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया। चींटी किनारे पर पहुँचकर बहुत खुश हुई और बोली, ‘आपने आज मेरी जान
बचाकर बहुत बड़ा उपकार किया है, सचमुच आप महान् हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद । ‘

यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला, ‘धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ, जिससे मैं आज तक अनजान था। आज पहली बार मैं अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ ।

ईश्वर ने हम सभी को अनोखी शक्तियाँ दी हैं, कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी एक काम में असफल होने का मतलब हमेशा के लिए अयोग्य होना नहीं है। खुद की काबिलियत को
पहचान कर आप वह काम कर सकते हैं, जो आज तक किसी ने नहीं किया है।

चमकीला पत्थर-Stories For Kids In Hindi

पत्थर Stories For Kids In Hindi

एक गरीब आदमी को राह चलते एक चमकीला पत्थर मिला। वास्तव में वह चमकीला पत्थर बिना तराशा हीरा था। उसकी कीमत वह गरीब आदमी जानता नहीं था। संयोग से उसी वक्त एक जौहरी उधर से गुजर रहा था। उसने वह चमकीला पत्थर गरीब के हाथ में देखा तो उसे सौ रुपए में खरीदना चाहा। जौहरी की पारखी नजरों ने उसकी सही कीमत पहचान ली थी।
उस गरीब को थोड़ा संदेह हुआ कि जौहरी इस पत्थर की इतनी कीमत क्यों दे रहा है। तो उसने उस पत्थर को सौ रुपए में बेचने से इनकार कर दिया। उसने जौहरी से कहा कि वो उसके पाँच सौ लेगा।

जौहरी ने गरीब से कहा, ‘मूर्ख, इस सड़े पत्थर के) पाँच सौ कौन देगा। चल चार सौ में दे दे। गरीब ने सोचा कि चलो ये भी फायदे का सौदा है। तो उसने हामी भर दी। परंतु जब जौहरी ने अपनी जेब टटोली तो उसमें सिर्फ तीन सौ निकले।
जौहरी ने गरीब से कहा कि वो इंतजार करे, जल्दी ही मैं बाकी रुपए लेकर लौटता हूँ।और जब जौहरी पूरे पैसे लेकर वापस आया तो उसने देखा कि गरीब के हाथ में चमकीले पत्थर की जगह रुपए थे। जौहरी ने गरीब से पूछा कि माजरा क्या है।

गरीब ने जौहरी को बताया कि उस पत्थर की सही कीमत तुम लगा ही नहीं रहे थे। उसकी असली कीमत तो उस दूसरे जौहरी ने लगाई और मुझे पूरे हजार रुपए दिए ।इस पर वह जौहरी झल्लाया और बोला, ‘मूर्ख, उस पत्थर की असली कीमत लाख रुपए थी। तुम्हें तो वो हजार रुपए में मूर्ख बना गया।’
‘मूर्ख तो तुम बन गए,’ गरीब आगे बोला, ‘तुम तो मुझे चार सौ रुपल्ली में मूर्ख बनाने चले थे कि नहीं? और मैंने तुम्हें मूर्ख बना दिया। ‘

 

 

 

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