Tenali Rama Hindi Story-स्वर्ग की कुंजी

स्वर्ग की कुंजी-Tenali Rama Hindi Story

Tenali Rama Hindi Story

एक बार राजा कृष्णदेव राय के राज्य में एक साधु आया। लोगों के बीच में अफवाहें फैली हुई थी कि वह पवित्र ऋषि चमत्कार कर सकता है, इससे सभी खुश थे। आस-पास और दूर के लोग धन और भोजन लेकर ऋषि के दर्शन करने वहां चले आए।

तेनालीराम इस समाचार से संतुष्ट नहीं था। उसने महसूस किया कि कुछ बात निश्चित रूप से गलत है। इसलिए उसने खुद ही सब कुछ जांचने का फैसला किया। वह उस जगह पहुंच गया, जहां कई लोग एक रस्म के लिए इकट्ठे हुए थे। साधु उनके बीच में अपनी आंखें बंद करके बैठा कुछ बुदबुदा रहा था ।

तेनालीराम ने साधु के होंठों के हिलने की गति से ये जानने का फैसला किया कि वह कौन सा मंत्र पढ़ रहा है ? तेनालीराम एक विद्वान था। वह जल्द ही समझ गया कि साधु एक धोखेबाज है और कुछ नहीं हैं, क्योंकि मंत्र उच्चारण के रूप में वह कुछ अनाप-शनाप कह रहा था। उसने साधु को सबक सिखाने का निर्णय किया।

वह अपने आसन से उठकर साधु के पास चला गया और वह साधु की दाढ़ी से एक लहराते बाल को खींच कर बोला, “मुझे स्वर्ग में जाने के लिए कुंजी मिल गयी है। ‘

उसने घोषणा की “ये साधु एक महान मनुष्य हैं। अगर आप इनकी दाढ़ी से एक बाल लेकर अपने पास रखेंगें, तो आप मरने के बाद सीधे स्वर्ग जाएंगे। ”

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साधु जो अभी अपनी दाढ़ी के खिंचने से लगी चोट के कारण सदमे में था, उसे ये एहसास हो गया कि अब उसके साथ क्या होने वाला है। वह अपनी जान बचाने के लिए सरपट भागने लगा और लोग भी उसका पीछा करते हुए उसके पीछे भागने लगे।

 

तेनाली और सुलतान आदिलशाह-Tenali Rama Hindi Story

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कभी विजयनगर पर राजा कृष्णदेव राय का शासन था और दिल्ली पर सुलतान आदिलशाह का एक बार दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया। युद्ध काफी दिनों तक चला और काफी लोगों की जानें गई। थककर दोनों राजाओं ने समझौता करने का विचार किया। दिल्ली के सुलतान आदिलशाह ने राजा कृष्णदेव राय को संधि पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए आमंत्रित किया। कृष्णदेव अपने दरबारियों के साथ दिल्ली गए।

दिल्ली में राजा कृष्णदेव और उनके साथियों का भव्य स्वागत हुआ। अच्छी साज-सज्जा, अच्छा खान-पान और आराम का पूरा प्रबन्ध था। राजा कृष्णदेव बहुत ही प्रभावित हुए। उनकी नजरों में आदिलशाह का कद बहुत बढ़ गया।

एक दिन रात्रि के भोजन के समय आदिलशाह ने हिन्दू पौराणिक कथाओं को सुनने की इच्छा जताई। एक विद्वान ने आकर महाभारत की कथा का कुछ भाग उन्हें सुनाया। हस्तिनापुर के लिए कौरव और पांडवों की लड़ाई का कुछ

भाग सुनने पर आदिल शाल ने कृष्णदेव राय से कहा, “मैंने आपके दरबार के विद्वानों के बारे में बहुत सुन रखा है। मैं चाहता हूं कि वे दुबारा महाभारत लिखें, जिसमें मैं और मेरे मित्र पांडव हों तथा आप और आपके मित्र कौरव हों । ”

राजा कृष्णदेव राय बहुत सोच में पड़ गए । वे मन ही मन सोचने लगे, “भला यह कैसे संभव है। महाभारत जैसे पवित्र ग्रंथ को दुबारा कैसे लिखा जा सकता है?”

परंतु वह सुलतान को मना नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने शांत भाव से सुलतान से वादा किया कि वे अपने विद्वानों से इस बारे में बात करेंगे।

अपने राज्य वापस आकर उन्होंने विद्वानों की सभा बुलाई। इस बात को सुनकर सभी चिंतित हो गए। इस समस्या का किसी के पास कोई समाधान नहीं था। अचानक राजा को

तेनाली राम की याद आई। उन्होंने कहा, “ तेनाली राम तुमने हमारी बहुत सारी समस्याओं का समाधान किया हैं। इस समस्या का समाधान बताओ। ”

तेनाली राम ने सिर झुकाकर कहा, “आप मुझे एक दिन का समय दें, मैं इस समस्या का समाधान ढूंढता हूं।

राजा के पास कोई और उपाय तो था नहीं। वे तेनाली राम के उपाय की प्रतीक्षा करने लगे।

अगले दिन तेनाली राम सुलतान आदिलशाह के दरबार में पहुंचे और हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से बोले, “हुजूर, आपके अनुरोध पर हमारे कुछ विद्वानों ने महाभारत की रचना शुरू कर दी है। पर थोड़ी सी समस्या है….।”

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सुलतान के समस्या पूछने पर तेनालीराम ने कहा कि वह उन्हें अकेले में समस्या बताना चाहते हैं। दरबार में इस विषय पर बात करना उचित नहीं है ।

सुलतान ने शाम के समय तेनालीराम को बुलावा भेजा। आदरपूर्वक उन्हें नमस्कार कर तेनालीराम बोले, “हुजूर, आपने महाभारत लिखने के शुभ कार्य का जो दायित्व हम पर सौंपा है, वह हमारे लिए बहुत ही सम्मान की बात है। पर थोड़ी सी समस्या है। महाभारत में पांडव पांच भाई थे, पर उनका विवाह एक ही औरत ‘द्रौपदी’ से हुआ था । आपने अनुरोध किया था, आपको उदार बड़े भाई के रूप में

चित्रित किया जाए तथा आपके मित्रों को आपके चार भाई के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को सोचते हुए हम लोग ऐसा करने में खुद को……….।”

तेनालीराम के वाक्य पूरा करने से पहले ही सुलतान ने तेनाली राम को रोक दिया और क्रोधित होते हुए बोले, “ यह सही नहीं है। मुझे महाभारत नहीं लिखवाना है, कृपया अपने आदमियों को तुरंत लिखने से मना कर दो ।’

“लेकिन हुजूर…..” तेनाली ने कुछ कहना चाहा, पर आदिलशाह उसे रोकते हुए बोले, “देखो कवि, मैं इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता। यदि तुम शांति चाहते हो तो तुरंत इस काम को रुकवा दो। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि दिल्ली और विजयनगर में सौहार्द बना रहे” यह कहकर आदिलशाह एक झोंके की तरह कमरे से निकल गये।

तेनालीराम ने जाकर अपने राजा को यह शुभ समाचार दिया। सबने तेनालीराम की चतुराई की प्रशंसा की।

अदृश्य वस्त्र-Tenali Rama Hindi Story

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एक दिन राजा कृष्णदेव राय के दरबार में एक बहुत ही खूबसूरत महिला आई। उसकी सुंदरता को देखकर जो जहां था वहीं गूंगा होकर मूर्ति की तरह खड़ा रह गया। महिला राजा के पास पहुंचकर सादर अभिवादन कर बोली, “महाराज, मैं एक बुनकर हूं। हम लोग बुनने की जादुई कला में पारंगत हैं। मैं आपके लिए एक नमूना लाई हूं………” यह कहकर उसने माचिस की डिबिया से एक सिल्क की साड़ी निकाली। साड़ी का मुलायम और हल्का कपड़ा देखकर राजा हैरान रह गया।

राजा ने खुश होकर कहा, “यह तो हवा की तरह है।” वह बोली, “जी महाराज, एक विशेष तकनीक से इस नायाब वस्त्र को बनाया गया है। हमलोग एक नई योजना पर काम कर रहे हैं। हम लोग एक ऐसा वस्त्र बुन रहे हैं, जो इस साड़ी से भी हल्का, पतला और मुलायम होगा। हम लोग उसे ईश्वरीय वस्त्र कहते हैं। क्योंकि अभी तक उसे केवल देवताओं ने ही पहना है ”

राजा और सभी दरबारी बड़े ही ध्यान से महिला की बातें सुन रहे थे । राजा ने कहा, “ठीक है, मैं इस योजना के लिए

धन दूंगा, पर योजना पूरी होने पर वस्त्र का नमूना आप मुझे उपहार स्वरूप देंगी। ”

महिला राजी हो गई। राजा ने उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरा एक बड़ा सा थैला दे दिया। थैले को लेकर वह प्रसन्नतापूर्वक चली गई।

बहुत महीने बीत गए, पर महिला का कुछ पता नहीं था। राजा परेशान होने लगे। राजा ने अपने कुछ मंत्रियों और सेवकों को काम की प्रगति को देखने भेजा। उसकी

कार्यशाला में जाकर सभी चकित रह गए। वहां लूम पर सात व्यक्ति पूरी तन्मयता से वस्त्र बुन रहे थे । वे इतने तन्मय थे कि उन्हें इनके आने का पता भी नहीं चला। लूम तो था, पर धागा कहीं दिखाई नहीं दिया और न ही कोई बुना हुआ वस्त्र हैरान परेशान मंत्री और सेवक लौट आए और यह आश्चर्यजनक बात उन्होंने राजा को बताई। क्रोधित राजा ने तुरंत महिला को बुलवाया।

महिला के साथ कई लड़कियां खाली थाल लेकर आई। राजा का अभिवादन कर महिला ने कहा, “महाराज मैं आपके लिए वस्त्रों का नमूना लाई हूं। ” यह कहकर उसने सेविकाओं से थाल राजा को देने का इशारा किया और बोली, “महाराज, यह ईश्वरीय वस्त्र का नमूना है। यह आम आदमी के लिए अदृश्य है पर जो बुद्दीमान और चतुर है वही इसकी सुंदरता और भव्यता को समझ सकते हैं। ”

महिला की बातें सुनकर मंत्री और सेवक सभी हैरान रह गए। उन्होंने अपने मन में सोचा कि इस समय यदि उन्होंने कुछ भी कहा तो वे चतुर नहीं बल्कि मूर्ख कहलाएंगे। उन्होंने भी मूर्ख कहलाने से बचने के लिए एक चाल चली। वे राजा के पास जाकर बोले, “महाराज, यह कपड़ा कितना बढ़िया और कीमती है। इसकी कढ़ाई तो कमाल की है। इतनी नायाब चीज तो बस एक राजा को ही शोभा देती है।”

राजा यह सुनकर परेशानी में पड़ गए। यदि वह कहते कि उन्हें वस्त्र दिख नहीं रहा है तो वे मूर्ख कहलाते। यदि वे कहते हैं कि उन्हें वस्त्र दिख रहा है, तो महिला उन्हें मूर्ख बनाकर सारे पैसे हड़प कर जाती। राजा ने तेनालीराम से सलाह करने का सोचा । उन्होंने इशारे से तेनालीराम को पास बुलाया और सारी बात बताकर उसकी सलाह मांगी।

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तेनालीराम मुस्कराए और उन्होंने महिला से कहा, “मोहतरमा, हम आपकी कला की कद्र करते हैं। उपहार रूपी इस ईश्वरीय वस्त्र को स्वीकार करके हमें बहुत प्रसन्नता

हो रही है। पर महाराज की इच्छा है कि आप इसे दरबार में पहनकर दिखाएं, जिससे सभी इसकी सुंदरता को देखकर इसकी प्रशंसा कर सके।

महिला समझ गई कि उसकी चाल उसी पर उल्टी पड़ गई है। अब उसके सामने दो ही उपाय थे या तो वह अपनी गलती स्वीकार करे या फिर निर्वस्त्र होकर लोगों के सामने आए। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ी और माफी मांगने लगी। दयालु राजा ने उस महिला को क्षमा कर दिया। पर ने उसे स्वर्ण मुद्राओं का बड़ा थैला वापिस लौटाना ही पड़ा, जो उसने राजा से लिया था।

रामायण पाठ-Tenali Rama Hindi Story

Tenali Rama Hindi Story रामायण पाठ तेनाली रामा के किस्से

जब राजा कृष्णदेव राय विजयनगर राज्य पर शासन करते थे, उस समय विक्रम सिम्हापुरी नामक एक छोटे से शहर की गणिकाओं के बारे में बहुत बातें होती थीं, जो बहुत चालाक और क्रूर थीं। उनमें सबसे चालाक कंचनमाला थी। एक बार कंचनमाला ने एक विद्वान को रामायण गायन के लिए चुनौती देते हुए शर्त रखी कि गायन ऐसा होना चाहिए, जिससे वो पूरी तरह संतुष्ट हो। अगर वह कहेगी कि, वह संतुष्ट है, तब ही विद्वान की जीत मानी जाएगी । और अगर वह नहीं कहेगी, तो उस विद्वान को उसका गुलाम बनना पड़ेगा। हर कोई जानता था, कंचनमाला कभी नहीं कहेगी कि वह संतुष्ट है। इसी तरह से उसने कई विद्वानों को गुलाम बनाया। था।

एक दिन तेनालीराम ने फैसला किया कि वह उस महिला को उसके बनाए खेल में हराएगा और उन सभी गुलाम लोगों को मुक्त करवाएगा। उसने अपना वेश बदला और कंचनमाला के घर गया। वहां पहुंचने पर उसने घोषणा की,

लेकिन यह सब बेकार हो गया, जब कंचनमाला एक जोरदार जम्हाई लेकर अपने नरम बिस्तर पर लेट गई क्योंकि यह लग रहा था कि वह ऊब गई थी।

तेनालीराम ने फिर गा बजाकर नाटकीय रुप में बताया कि कैसे श्री राम और लक्ष्मण, सीता जी के खो जाने पर दुःख में डूबकर वन-वन भटक रहे थे। तभी वे वानरों के एक समूह से मिले। जिसमें से राम के भक्त वानर हनुमान ने दुष्ट राजा रावण के शहर, लंका में जाकर श्रीराम का संदेश सीता को दिया।

कंचनमाला ने करवट बदलते हुए कहा, “मैं संतुष्ट नहीं हूं। तुम सचमुच एक उबाऊ आदमी हो, मेरी इच्छा तो सजीव नाटक देखने की थी ।

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अचानक तेनालीराम अपने आसन से छलांग लगाकर जहां कंचनमाला बैठी थी, वहां बैठ गया। उसने कहा, “जानती हो इस प्रकार हनुमान जी ने एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंचने के लिए छलांग लगाई थी,” और उसके बाद वह कंचनमाला के बिस्तर से पास के दूसरे बिस्तर पर छलांग मार कर पहुंच गया।

“ इस तरह हनुमानजी ने विशाल समुद्र को पार किया था, ” तेनाली ने कहा और फिर से उसने कंचनमाला पर छलांग लगा दी। कंचनमाला डरकर जोर से चिल्लाई । तेनाली ने कहा, “इस प्रकार हनुमान जी हर उस व्यक्ति से लड़े थे, जिसने उन्हें पकड़ने की कोशिश की थी,” और इसी के साथ उसने कंचनमाला को मुक्के मारना शुरू कर दिया। वह दर्द के साथ कराहने लगी।

तब तेनालीराम ने एक मोमबत्ती ली और कहा, “जैसे हनुमान जी ने पूंछ में आग लगाई थी और पूरी लंका नगरी को आग की भेंट कर दिया था, ऐसा ही सजीव नाटक मैं तुमको दिखाऊंगा,” और ऐसा कहकर तेनालीराम पर्दो और कालीन को आग लगाने लगा। क्षण भर में ही कमरे में आग लग गई।

बेचारी कंचनमाला अपनी जान बचाने के लिए घर छोड़ कर भागने लगी। अगले दिन कंचनमाला अदालत में गई और

तेनाली के खिलाफ शिकायत की। जब राजा ने तेनालीराम से पूछा, तो उसने कहा, “महाराज, इस महिला ने कई विद्वानों को बेवकूफ बनाकर गुलाम बना लिया है। ”

राजा ने तेनालीराम के पक्ष में अपना निर्णय दिया। कंचनमाला ने सभी गुलाम लोगों को मुक्त कर दिया

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